वास्तव में पूजनीय यह उक्ति संत कबीर दास जी द्वारा कही गई हैकर्तव्य परायणता, ईमानदारी आदि तो मापदंड संत कबीर के द्वारा यह उक्ति ऐसे लोगों के है, जीवन में बड़े महत्वपूर्ण है इसे आम आदमी लिए कही गई है जो कि किसी भी कार्य मात्र व्यक्त करते हैं किंतु सही मायने में इन पर में आलोचना करते हैं। कार्य की नुक्स जो अमल करता है वह वास्तव में पूजनीय निकालना जिनकी आदत होती है। और स्तुत्य है। संत कबीर कहते हैं:जिसने कभी कार्य नहीं किया है उसे कार्य करने “कथनी तजि करनी करें, विष से अमृत होई।" के लिए निर्देश देते हुए यह उक्ति कहीं गई है। कहने का आशय है कि यदि हम व्यर्थ कहना बंद हम हुए उनकी इस बात पर चिंता ना करें जो कर दे और मात्र कर्म पर ही भरोसा करते हुए कि इस प्रकार है:कर्म करने लगे तो विष भी अमृत में बदल कथनी मीठी खांड सी, करनी विष की लोई। जाएगा। यानि कितनी ही विषम परिस्थिति कथनी तजि करनी करें, विष से अमृत होई। क्यों नहीं हो, कर्म करते रहने से हम उससे संत कबीर कहते हैं कि यदि किसी बात को कह परिस्थिति में सफलता का अनुपात कम हो देना तो बहुत बड़ा सुंदर है मिठास भरा शक्कर सकता है। लेकिन बिल्कुल असफल इसीलिए जैसा है लेकिन उसे क्रियान्वित करना विष के नहीं हो सकते क्योंकि कर्मशील है, अतः कर्म समान है। कभी निष्फल नहीं जाता यदि किसी कार्य के क्योंकि किसी भी कार्य को करने में जितनी करने की बजाय मात्र आलोचक है, नुक्स मेहनत लगती है। जिन दिक्कतों का सामना निकालते रहे तो समझे कि ऐसे वाहन में बैठे करना पड़ता हैवास्तव में यह कार्य करने हैं कि जो कि स्टार्ट है। लेकिन उसके पहिये वाला ही महसूस कर सकता है। सच बोलना, स्थिर हैं। वह अपने स्थान से चलेगी तो कैसे?
JEEVAN VAIBHAV